उत्तर प्रदेश में बुआ और बबुआ की जोड़ी ने शनिवार को मायावती के जन्मदिन पर राज्य में गठबंधन की घोषणा की। बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) और समाजवादी पार्टी (एसपी) दोनों 38-38 सीटों पर चुनाव लड़ेंगीं जबकि अन्य के लिए चार सीटें छोड़ी हैं पर किसके लिए छोड़ी हैं, यह स्पष्ट नहीं है। मायावती ने गरजते हुए कहा कि यह गठबंधन नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की रातों की नींद हराम कर देगा।

भाजपा विरोधी दल और विपक्ष अपने गढ़ में भाजपा को हराने के लिए इस जोड़ी पर अपनी उम्मीदें लगा रहे हैं। नोट करने वाली बात है कि भाजपा ने 2014 में उत्तर प्रदेश में अपनी कुल सीटों की एक-चौथाई सीटें ही जीती थीं। प्रधानमंत्री मोदी वाराणसी से सांसद हैं। जहाँ एक तरफ महागठबंधन उत्तर प्रदेश में भाजपा को हराने और दिल्ली से मोदी को बाहर करने की उम्मीद कर रहा है, वहीं पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने भाजपा के राष्ट्रीय सम्मेलन में कहा कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) अपने रिकॉर्ड को बेहतर करेगी और 2019 में 74 सीटें जीतेगी जो 2014 की टैली से एक अधिक।

उप-चुनावों में महागठबंधन की जीत से इसका सही मूल्यांकन नहीं किया जा सकता

पिछले साल हुए उप-चुनावों में गोरखपुर, फूलपुर और कैराना की तीन सीटों पर एक अनौपचारिक महागठबंधन ने भाजपा को करारी हार दी जिससे विपक्ष का विश्वास बढ़ा और उन्हें साथ आने की ज़रूरत महसूस हुई। महागठबंधन को उम्मीद है कि वह राज्य भर में भाजपा को हराने में सक्षम है जैसा कि उन्होंने उपचुनावों में किया था। उनके रणनीतिकार यह भूल जाते हैं कि उप-चुनाव स्थानीय मुद्दों पर लड़े जाते हैं।

जब मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करने गए तो उन्हें केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री का चयन नहीं करना था केवल उनके स्थानीय प्रतिनिधि का चुनाव करना था। फूलपुर और कैराना को किसी भी तरह से भाजपा का गढ़ नहीं कहा जा सकता क्योंकि 2014 में चुनावी इतिहास में पहली बार भाजपा ने फूलपुर को जीता। लोग मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री राज्य सरकार के लिए अपनी लोकसभा सीट छोड़ने की वजह से भी नाखुश हो सकते हैं।

अंकगणित में महागठबंधन एक खतरा पैदा कर रहा है लेकिन इसे कई चुनौतियों का सामना भी करना पड़ सकता है

महागठबंधन का संयुक्त वोट शेयर 2014 के वास्तविक आधार पर लगभग एनडीए के बराबर है। दोनों गठबंधनों को देखें तो भाजपा की उच्च जाति और गैर-यादव व अन्य पिछड़ा वर्ग के वोट ब्लॉक का अनुपात महागठबंधन के दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और यादवों के बराबर है। यदि 2014 में सपा और बसपा ने एक साथ चुनाव लड़ा होता तो एनडीए को 41, महागठबंधन को 37 और कांग्रेस दो सीटों पर बँटी होती।

हालाँकि, यह बात राजनीति के नए छात्रों को भी पता है कि किसी भी गठबंधन को वोटों का पूरा हस्तांतरण होने का पूर्वानुमान लगाना खतरनाक है। 5 प्रतिशत-10 प्रतिशत वोटों के एक छोटे रिसाव से भी अंकगणित बदल सकता है। बसपा ने पिछले गठबंधनों में वोट हस्तांतरण करने की अपनी क्षमता दिखाई है लेकिन बसपा उम्मीदवारों को सपा के वोटों के मिलने के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता है।

सपा और बसपा दोनों ने 2014 में अधिकांश सीटों पर चुनाव लड़ा था। अब लगभग आधे सपा और बसपा के उम्मीदवारों को इस बार मौका नहीं मिलने की संभावना है जिससे महागठबंधन को बड़ा झटका लग सकता है। उनमें से कुछ को शिवपाल यादव की पार्टी द्वारा चुना जा सकता है जिन्होंने घोषणा की है कि वे सभी सीटों पर चुनाव लड़ेंगे।

कुछ को कांग्रेस द्वारा भी समायोजित किया जा सकता है जिन्हें राज्य में महागठबंधन से बाहर रखा गया है। सपा ने एकजुट होकर 2014 के लोकसभा चुनाव लड़े थे। चाचा शिवपाल के पास पुरानी समाजवादियों का समर्थन है जबकि भतीजा अखिलेश नई समाजवादी पार्टी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। भले ही शिवपाल यादव की पार्टी 2-3 फीसदी वोट शेयर हासिल करने में सक्षम हो लेकिन महागठबंधन के लिए यह नुकसानदेह होगा।

सपा का वोट शेयर उप्र के कुछ हिस्सों में केंद्रित है जबकि बसपा का वोट शेयर तुलनात्मक रूप से अधिक फैला हुआ है इसलिए बसपा 2014 में एक भी सीट जीतने में नाकाम रही थी। इसका मतलब है कि सपा बसपा से ज्यादा सीटें जीत सकती है जिससे तनाव बढ़ेगा और मायावती के साथ साझा मतदान के बाद अखिलेश पर वोटों का हस्तांतरण नहीं करने का आरोप भी लगा सकते हैं।

मायावती की चमक पहले से कम हुई है। जबकि उन्होंने जाटव मतदाताओं (12 फीसदी-14 फीसदी आबादी) को बनाए रखने का प्रबंधन कर रखा है और गैर-जाटव मतदाताओं (7 फीसदी-9 फीसदी आबादी) पर अपनी पकड़ खो दी है जो की भाजपा में स्थानांतरित हो गए हैं।

महागठबंधन से अजीत सिंह की राष्ट्रीय लोकदल गायब है जिसकी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटों के बीच बहुत बड़ी उपस्थिति है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में मायावती भाजपा के साथ-साथ कांग्रेस की भी बहुत आलोचना करती नज़र आ रही हैं लेकिनअखिलेश ने कांग्रेस पर सवाल से अपना मुँह फेर लिया जिससे इस मुद्दे पर दोनों की असहमति झलकती है।

यदि वे कांग्रेस की आलोचना करते हैं तो इससे इस पुरानी बड़ी पार्टी को उत्तर प्रदेश में जमकर चुनाव लड़ने का प्रोत्साहन मिलेगा। 2014 में उप्र में कांग्रेस को 7.5 प्रतिशत वोट मिले, दो सीटों पर जीता और छः सीटों पर उपविजेता रही। इसका आठ से 10-विषम सीटों पर प्रभाव है, जो महागठबंधन के अंकगणित को खराब कर सकता है।

…और यह 2019 के लिए भाजपा को कथात्मक (नैरेटिव) प्रदान करता है

सपा और बसपा जिन्होंने आखिरी बार 1993 में गठबंधन किया था और पिछले दो-ढाई दशकों से इनकी एक-दूसरे के साथ अनबन थी जहाँ मायावती मुलायम सिंह यादव और कंपनी पर उनकी (कुख्यात गेस्टहाउस मामला) हत्या का प्रयास करने का आरोप लगाया करती थीं। वे दोनों ही शीर्ष दावेदार रहे हैं और इसलिए कई वर्षों से विरोधियों के रूप में जमकर प्रतिस्पर्धा की है।

मोदी को रोकने और उनकी विश्वसनीय छवि को धूमिल करने का प्रयास करने के लिए बने अवसरवादी गठबंधन को भाजपा जल्द ही करारा जवाब देगी। पार्टी महागठबंधन से युवा दलितों और यादवों को हटाने की कोशिश करेगी। अल्पसंख्यक वोट 2014 लोकसभा चुनाव में बसपा (18 प्रतिशत), सपा (58 प्रतिशत) और कांग्रेस (11 प्रतिशत) के बीच विभाजित हुए थे।

महागठबंधन को उम्मीद है कि अल्पसंख्यक वोट (20 फीसदी) उनके लिए मज़बूत और पक्के हैं। इससे भाजपा को यह आरोप लगाने का अवसर मिलता है कि महागठबंधन अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की राजनीति में उलझा हुआ है। यह भाजपा के पक्ष में हिंदू वोटों को अच्छी तरह से समेकित कर सकता है और उसी तरह का परिणाम मिल सकता है जैसा कि 2014 में मिला था।

मायावती को इंतजार है अपने ‘गौड़ा’ पल का?

मायावती जो उप्र से बड़ी सीटें जीतने की उम्मीद करती हैं, वे 1996 में देवेगौड़ा की तरह त्रिशंकु संसद की स्थिति में भारत का प्रधानमंत्री बनने के लिए प्रेरित हो सकती हैं। यह उस पार्टी के नेता के लिए एक कठिन काम है जिनका वर्तमान में लोकसभा में एक भी सांसद नहीं है।

मायावती की दृष्टि में ये चुनाव बसपा के अस्तित्व के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। यदि इस बार फिर से स्थितियाँ अनूकूल नहीं होती हैं तो पार्टी विलुप्ति की कगार पर भी खड़ी हो सकती है। इसलिए उन्होंने दाँव लगाने के लिए मुलायम के बेटे अखिलेश को हाथ पकड़ा है।

देखा जाए तो सपा-बसपा का एक साथ आना भाजपा के लिए चुनौती प्रस्तुत करता है और उसे अपना दबदबा बनाए रखने के लिए अपना किला मज़बूत करना होगा।

हालाँकि गठबंधन का नाता मात्र अंकगणित से ही नहीं है बल्कि इसमें रसायन विज्ञान का भी योगदान है। उप्र में एक आकर्षक प्रतियोगिता चल रही है और दोनों पक्षों में संबंधित ताकत और कमजोरियाँ हैं जिसका मतलब है कि प्रत्येक सीट पर ज़ोरदार टक्कर देखने को मिल सकती है।

 

This article was first published on hindi.swarajyamag.com on 16 Jan, 2019.

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